विशेष संवाददाता, नई दिल्ली: होम कारोबार बिज़नेस डायरी बाजार स्टार्टअप्स कॉर्पोरेट पर्सनल फाइनेंस More •••
🔍 विस्तृत घटनाक्रम एवं मुख्य बिंदु
भारत की आर्थिक विकास दर के ताजा आंकड़ों ने देश के नीतिगत गलियारों में फिर बहस छेड़ दी है। सोमवार को जारी आंकड़ों के अनुसार, चालू वित्त वर्ष 2026-27 की पहली तिमाही (अप्रैल-जून) में देश की जीडीपी (सकल घरेलू उत्पाद) 7.8 प्रतिशत की दर से बढ़ी है। पश्चिम एशिया के तनाव और वैश्विक अनिश्चितताओं के बीच भारत की यह रफ्तार उम्मीद से अधिक रही है। इस मजबूत वृद्धि दर ने न केवल रिजर्व बैंक के सात प्रतिशत के अनुमान को पीछे छोड़ा है, बल्कि भारत को दुनिया की सबसे तेजी से बढ़ती प्रमुख अर्थव्यवस्था भी बनाए रखा है। हालांकि, इन आंकड़ों के आते ही आर्थिक विशेषज्ञों और विपक्षी दलों के बीच तीखी बहस शुरू हो गई है।
आंकड़ों पर उठ रहे सवालों के बीच पूर्व मुख्य आर्थिक सलाहकार (सीईए) कृष्णमूर्ति वी. सुब्रमण्यन ने विकास दर पर संदेह जताने वालों को आड़े हाथों लिया है। उन्होंने कहा कि साक्ष्यों पर आधारित भरोसेमंद आशावाद (क्रेडिबल ऑप्टीमिज्म) को चियरलीडिंग नहीं कहा जा सकता। सुब्रमण्यन के अनुसार, बिना सबूत के सिर्फ आशावान होना हवाई सोच है, लेकिन बिना किसी ठोस साक्ष्य के लगातार निराशावाद फैलाना भी कोई बौद्धिक चतुराई या समझदारी नहीं है। उन्होंने याद दिलाया कि पांच साल पहले उन्होंने इस दशक में भारत की विकास दर सात प्रतिशत से अधिक रहने की भविष्यवाणी की थी, जो सच साबित हो रही है।
💬 आधिकारिक बयान एवं रिपोर्ट
पूर्व मुख्य आर्थिक सलाहकार ने आईएमएफ जैसी वैश्विक संस्थाओं और कुछ अर्थशास्त्रियों पर भारत की प्रगति को लगातार कम आंकने का आरोप लगाया। उन्होंने कहा कि आईएमएफ ने वित्त वर्ष 2024 से 2027 के लिए क्रमशः 6.6%, 6.3%, 6.2% और 6.1% की ग्रोथ का अनुमान लगाया था, जो वास्तविक दर से काफी कम रहे। सुब्रमण्यन के अनुसार, जब पूर्वानुमानों में गलतियां लगातार एक ही दिशा में हो रही हों, तो संस्थाओं को अपने तौर-तरीकों की समीक्षा करनी चाहिए।