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बुधवार, 09 सितंबर 2026
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हिमालय दिवस विशेष: वैज्ञानिकों की चेतावनी, पहाड़ की वहन क्षमता के मुताबिक विकास नहीं हुआ तो बढ़ेंगे खतरे

हिमाचल प्रदेश का हिमालयी क्षेत्र अब सिर्फ बर्फ पिघलने की चुनौती ही नहीं, बल्कि जलवायु परिवर्तन, अनियंत्रित निर्माण, भूस्खलन, जंगलों में कमी और बढ़ते मानवीय दबाव से जूझ रहा है।
हिमालय दिवस विशेष: वैज्ञानिकों की चेतावनी, पहाड़ की वहन क्षमता के मुताबिक विकास नहीं हुआ तो बढ़ेंगे खतरे हिंदीबात विशेष
तस्वीर: सऊदी क्राउन प्रिंस एमबीएस, तुर्किये राष्ट्रपति एर्दोगन और पाक पीएम शहबाज शरीफ (आधिकारिक संदर्भ)

विशेष संवाददाता, नई दिल्ली: होम हिमाचल प्रदेश शिमला कांगड़ा मंडी सोलन चम्बा More •••

🔍 विस्तृत घटनाक्रम एवं मुख्य बिंदु

बदलते मौसम से हिमालय पर दबाव : रंधावा जलवायु परिवर्तन से हिमालयी क्षेत्र में तापमान बढ़ रहा है, जिससे ग्लेशियरों के द्रव्यमान में कमी और उनके पिघलने की प्रक्रिया तेज हो रही है। ग्लेशियर झीलों के विस्तार और अस्थिरता से ग्लेशियल झील विस्फोट बाढ़ का जोखिम बढ़ रहा है, जबकि बदलते वर्षा पैटर्न अत्यधिक वर्षा और बादल फटने जैसी घटनाओं के जोखिम को प्रभावित कर सकते हैं। इसलिए हिमाचल में विकास योजनाओं को हिमालय की संवेदनशील पारिस्थितिकी, जल सुरक्षा और आपदा जोखिम को ध्यान में रखकर वैज्ञानिक आधार पर तैयार करना जरूरी है। - डाॅ. एसएस रंधावा, पर्यावरण वैज्ञानिक

बर्फबारी सिमटी, अब फरवरी-मार्च में गिर रही बर्फ हिमाचल में जलवायु परिवर्तन का असर बर्फबारी के क्रम पर भी पड़ा है। 80 और 90 के दशक में नवंबर से जनवरी के बीच नियमित और भारी हिमपात होता था, लेकिन अब बर्फबारी के दिन घट रहे हैं। वर्ष 2020 में 69.4 सेंटीमीटर बर्फ दर्ज हुई थी, 2021-22 में अच्छा हिमपात हुआ लेकिन 2023 से 2025 के बीच दिसंबर-जनवरी में बर्फबारी बेहद कम रही। साल 2025 में 33 सेंटीमीटर हिमपात दर्ज किया गया। जलवायु परिवर्तन के कारण कमजोर पश्चिमी विक्षोभ को इसका कारण माना जा रहा है। बर्फबारी का दौर पारंपरिक दिसंबर-जनवरी के बजाय फरवरी और मार्च के शुरुआती हफ्तों की ओर बढ़ गया है।

💬 आधिकारिक बयान एवं रिपोर्ट

जलवायु परिवर्तन से सेब उत्पादन में भारी उतार-चढ़ाव हिमाचल में छह साल में सेब उत्पादन के आंकड़ों में भारी उतार-चढ़ाव देखने को मिला है। वर्ष 2020-21 में 2.40 करोड़ पेटियां उत्पादन हुआ था, जो 2022-23 में बढ़कर 3.36 करोड़ और 2025-26 में 3.49 करोड़ पेटियों तक पहुंचा। हालांकि, इस साल प्रतिकूल मौसम के चलते उत्पादन करीब 2.15 करोड़ पेटियों तक सिमटने का अनुमान है। सर्दियों में पर्याप्त बर्फबारी न होना, कम चिलिंग आवर्स, बेमौसम बारिश, ओलावृष्टि और तापमान में उतार-चढ़ाव ने बागवानों की चिंता बढ़ाई है।

🔍 संपादकीय पड़ताल एवं स्रोत विवरण (Editorial Provenance & Verification)
✍️ रिपोर्टिंग: अमर उजाला ब्यूरो
🏛️ प्राथमिक स्रोत: अमर उजाला (Amar Ujala Breaking News)
🔬 सत्यापन डेस्क: हिंदीबात रिसर्च डेस्क (HindiBaat Research)
🛡️ पड़ताल स्थिति: ✅ तथ्य-परीक्षित एवं सत्यापित
मूल संदर्भ लिंक: मूल स्रोत देखें ↗
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हिंदीबात संपादकीय डेस्क

विशेष संवाददाता

डिजिटल मीडिया आचार संहिता 2021 के अनुरूप निष्पक्ष, तथ्य-आधारित और स्वतंत्र रिपोर्टिंग। प्रत्येक खबर में 5W1H विश्लेषण और पाठक-केंद्रित स्पष्टता हमारा संकल्प है।

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