
वंदे मातरम् की 150वीं वर्षगांठ पर संसद में चल रही चर्चा ने एक नए मोड़ को लिया जब शिवसेना यूबीटी के सांसद अरविंद सावंत ने वंदे मातरम् के रचयिता बंकिम चंद्र चटर्जी से जुड़ी एक दिलचस्प घटना का जिक्र किया। यह घटना 1873 की है, जब बंकिम चंद्र मुर्शिदाबाद जिले के बहरामपुर में डिप्टी मजिस्ट्रेट के पद पर तैनात थे। उस समय, भारतीयों और अंग्रेजों के बीच भेदभाव बहुत ज्यादा था, और अंग्रेज अपनी ताकत और प्रभाव के कारण भारतीयों को अपमानित करने से नहीं हिचकिचाते थे।
इसी दौरान, एक दिन बंकिम चंद्र पालकी में बैठकर अपने काम से लौट रहे थे, जब突然 कर्नल डफिन नामक एक अंग्रेज अधिकारी ने उन्हें पालकी से उतार दिया। यह घटना बंकिम चंद्र के लिए बहुत अपमानजनक थी, और इसने उन्हें बागी बना दिया। अरविंद सावंत ने इस घटना का उदाहरण यह बताने के लिए दिया कि स्वाभिमान और आत्मसम्मान के लिए लड़ना ही सच्ची राष्ट्रभक्ति है। यह घटना न केवल बंकिम चंद्र के लिए, बल्कि पूरे देश के लिए एक महत्वपूर्ण मोड़ बन गई, जिसने वंदे मातरम् की नींव रख दी।
बंकिम चंद्र चटर्जी की यह घटना भारतीयों के लिए एक प्रेरणा का स्रोत बन गई, और उन्होंने अपनी रचना वंदे मातरम् के माध्यम से देश की स्वतंत्रता की लड़ाई में योगदान दिया। यह रचना न केवल एक गीत बन गई, बल्कि एक आंदोलन बन गया, जिसने पूरे देश को एकजुट किया और स्वतंत्रता की लड़ाई में एक महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। आज, वंदे मातरम् की 150वीं वर्षगांठ पर, हम बंकिम चंद्र चटर्जी की इस घटना को याद करते हैं और उनकी राष्ट्रभक्ति और स्वाभिमान की भावना को सलाम करते हैं।
इस घटना ने न केवल बंकिम चंद्र चटर्जी को बागी बना दिया, बल्कि यह पूरे देश के लिए एक महत्वपूर्ण सबक भी है। यह हमें सिखाती है कि स्वाभिमान और आत्मसम्मान के लिए लड़ना ही सच्ची राष्ट्रभक्ति है, और हमें अपने देश और अपनी स
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