
दिल्ली उच्च न्यायालय ने सीमा सुरक्षा बल (बीएसएफ) को कड़ी फटकार लगाई है, जिसमें कहा गया है कि एक दिव्यांग बेटे के कारण ट्रांसफर से इनकार करना गलत था। यह मामला एक बीएसएफ जवान का है, जिसने अपने दिव्यांग बेटे की देखभाल के लिए अपने परिवार के साथ रहने के लिए ट्रांसफर की मांग की थी। लेकिन बीएसएफ ने इसकी अनुमति नहीं दी, जिसके बाद जवान ने दिल्ली उच्च न्यायालय का दरवाजा खटखटाया।
न्यायालय ने अपने फैसले में कहा कि बीएसएफ का यह निर्णय अस्वीकार्य है और यह मानवाधिकारों का उल्लंघन है। न्यायालय ने कहा कि दिव्यांग बेटे की देखभाल करना जवान की जिम्मेदारी है और इसके लिए उसे अपने परिवार के साथ रहने की अनुमति देनी चाहिए। न्यायालय ने बीएसएफ को निर्देश दिया है कि वह जवान को उसके परिवार के साथ रहने की अनुमति दे और उसके दिव्यांग बेटे की देखभाल के लिए आवश्यक व्यवस्था करे।
यह फैसला न केवल बीएसएफ जवान के लिए, बल्कि उन सभी लोगों के लिए एक बड़ी राहत है जो अपने दिव्यांग परिवार के सदस्यों की देखभाल के लिए संघर्ष कर रहे हैं। न्यायालय का यह फैसला यह दर्शाता है कि कानून दिव्यांग लोगों के अधिकारों की रक्षा के लिए हमेशा तैयार है। इससे यह भी पता चलता है कि सरकारी संगठनों को भी दिव्यांग लोगों के प्रति संवेदनशील होना चाहिए और उनकी जरूरतों को पूरा करने के लिए आवश्यक कदम उठाने चाहिए।
न्यायालय के इस फैसले का स्वागत करते हुए, कई सामाजिक संगठनों और दिव्यांग अधिकार कार्यकर्ताओं ने कहा है कि यह फैसला दिव्यांग लोगों के अधिकारों की रक्षा के लिए एक महत्वपूर्ण कदम है। उन्होंने कहा है कि यह फैसला न केवल बीएसएफ जवान के लिए, बल्कि सभी दिव्यांग लोगों के लिए एक बड़ी जीत है। उन्होंने सरकार से अपील की है कि वह दिव्यांग लोगों के अधिकारों की रक्षा के लिए और अधिक कदम उठाए।
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