विशेष संवाददाता, नई दिल्ली: वह इस आम धारणा को बदलना चाहती थीं कि म्युनिसिपल कॉर्पोरेशन के स्कूलों में पढ़ाई का स्तर अच्छा नहीं होता. इसके लिए उन्होंने क्लासरूम में सीखने के अनुभव को बेहतर बनाने पर ध्यान दिया.
🔍 विस्तृत घटनाक्रम एवं मुख्य बिंदु
खेल, एक्सपेरिमेंट और कहानियों के ज़रिए शिक्षा देने के साथ-साथ, उन्होंने पढ़ाई में पीछे रह गए स्टूडेंट के लिए एक 'निपुण कॉर्नर' बनाया. ऐसी जगह जहां वो अपनी स्पीड से सीख सकें.
'अडॉप्ट अ फ्रेंड' पहल के ज़रिए स्टूडेंट एक-दूसरे को अलग-अलग विषय पढ़ाते हैं, जबकि 'संविधान सांप-सीढ़ी' खेल बच्चों को उनके अधिकारों और कर्तव्यों के बारे में जानने में मदद करता है. कुंदा बच्छाव का काम सिर्फ़ क्लासरूम की चार दीवारों तक ही सीमित नहीं रहा.
💬 आधिकारिक बयान एवं रिपोर्ट
कोविड-19 महामारी के दौरान घर-घर जाकर किए गए सर्वे में उन्हें ऐसी लड़कियां मिलीं जिन्होंने पढ़ाई छोड़ दी थी और कुछ ऐसी जिनकी शादी हो गई थी. इसके बाद उन्होंने 2021 में 'एजुकेशनल गार्डियनशिप' पहल शुरू की, जिसकी शुरुआत पांच लड़कियों के साथ हुई. कुंदा बच्छाव बताती हैं कि कई लोग इस पहल से जुड़े और आज 150 लड़कियां उच्च शिक्षा हासिल कर रही हैं.
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